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माइक्रोसॉफ्ट ने खोले आईपैड के लिए दरवाजे
माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ का कामकाज संभालने के बाद अपनी पहली बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सत्य नडेला ने कहा, 'माइक्रोसॉफ्ट सभी तरह के डिवाइसेज इस्तेमाल करने वाले लोगों और संस्थाओं के लिए एमएस ऑफिस सेवा मुहैया कराएगी, न सिर्फ विंडोज कम्प्यूटर या टैबलेट यूजर्स के लिए।' कंपनी ने इसकी शुरआत आईपैड यूजर्स के लिए 'एमएस ऑफिस सूट' के साथ की है।
एमएस ऑफिस सूट में वर्ड, एक्सेल, पावर पॉइंट जैसी सेवाएं शामिल हैं। ये तीनों सेवाएं ऐप स्टोर से मुफ्त में डाउनलोड की जा सकेंगी। इसके लिए ऑफिस 365 का सब्सक्रिप्शन लेने की जरूरत नहीं होगी।
प्रतिस्पद्र्धा भी मिलेगी
अभी तक आईपैड के लिए एमएस ऑफिस सेवा शुरू न करने पर माइक्रोसॉफ्ट की आलोचना होती रहती थी। इसके विकल्प के रूप में ऐपल ने मोबाइल प्लेटफॉर्म पर खुद का सॉफ्टवेयर 'आईवर्क' पेश किया। इसके अलावा किंगसॉफ्ट और जोहो जैसे सॉफ्टवेयर भी मोबाइल के लिए काम करने लगे। अब माइक्रोसॉफ्ट ने आईपैड के लिए एमएस ऑफिस शुरू किया है, तो निश्चित तौर पर पहले से मौजूद एप्स से उसे चुनौती मिलेगी।
धर्म समाचार
नवरात्र में देवी मंदिरों पर उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
पुराना बस स्टैंड स्थित बगलामुखी मंदिर नवरात्र में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहता है। लेकिन यहां आने वाले श्रद्धालुओं को जाम की समस्या डोलनी पड़ती है। श्रद्धालुओं को वाहन खड़े करने के लिए भी जगह नहीं मिलती है। इन दिनों जेबकतरे भी सक्रिय हो जाते हैं और श्रद्धालुओं की जेब काट लेते हैं। श्रद्धालुओं की कार के शीशे तक तोड़कर सामान पार कर देते हैं।
यह मंदिर भगवान कृष्णकालीन बताया जाता है। श्रद्धालुओं का कहना है कि यह देवी तो असंभव को भी संभव कर देती हैं। श्रद्धालुओं का भी इस मंदिर में पूरा विश्वास है। जनपद के कोने-कोने से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु रोजाना दर्शन करने आते हैं। नवरात्र में तो यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन जाता है।
साप्ताहिक व्रत-त्यौहार
22 मार्च: श्रीएकनाथ षष्ठी, भारतीय शालिवाहन शक सम्वत् 1936 प्रारंभ, शनिदेव दर्शन-पूजन।
23 मार्च: शीतली सप्तमी बसौड़े की तैयारी, भानु-सप्तमी पर्व (सूर्यग्रहण तुल्य), कालाष्टमी व्रत, सरदार भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु शहीद दिवस।
24 मार्च: शीतलाष्टमी- शीतलादेवी पूजा और बसौड़ा, अष्टका श्राद्ध, संतान अष्टमी व्रत, मेला कैलादेवी, श्रीऋषभदेव जन्मोत्सव एवं दीक्षा दिवस वर्षी तप प्रारंभ (जैन)।
25 मार्च: वाराह नवमी, अन्वष्टका श्राद्ध, वृद्ध अंगारक पर्व (काशी), गणेशशंकर विद्यार्थी बलिदान दिवस, क्षयरोग उन्मूलन दिवस।
26 मार्च: दशामाता व्रत-पूजा, श्रीचिंतामणिगणेश दर्शनयात्रा (काशी, उज्जायिनी)।
27 मार्च: पापमोचनी एकादशी व्रत, बृहस्पतिवार व्रत कथा, लक्ष्मी-नारायण दर्शन-पूजन, मां कर्माबाई जयंती।
28 मार्च: प्रदोष व्रत, मधुकृष्ण त्रयोदशी, रंगतेरस, आदिकेशव दर्शन (काशी), हिंगलाज महापूजा, वारुणी पर्व प्रात: 7.51 बजे से सूर्यास्त तक।
संसार शून्य से पैदा हुआ है
प्रत्येक ठोस, द्रव और वाष्प है और प्रत्येक वाष्प ऊर्जा है। ऊर्जा भी पदार्थ की अंतिम इकाई नहीं है। ऊर्जा ताप, विद्युत और प्रकाश का योग है। ताप विद्युत और प्रकाश की उत्पत्ति शून्य से होती है। कोई भी शून्य न पदार्थ है, न तरल है और न वाष्प है। वह केवल शून्य है।
संसार शून्य से पैदा हुआ है, यह केवल दृष्टिभेद है, भ्रम है। अपदार्थ से पदार्थ पैदा नहीं हो सकता। शून्य से शून्य ही पैदा होता है। संसार की वस्तुओं को हम देखते हैं, लेकिन इसे देखने पर भरोसा करने वाला भ्रम में पड़ जाता है। यह संपूर्ण संसार भ्रमपूर्ण है, क्योंकि महानतम वैज्ञानिक आइंस्टीन ने पदार्थ को झुठलाते हुए कह दिया था कि जो पदार्थ आप देखते हैं, जो संसार आप देखते हैं वह ऊर्जा है। आपसे देखने में भूल हो रही है।
दरअसल, पदार्थ है ही नहीं, केवल ऊर्जा है। ऐसा विज्ञान मानता है। विज्ञान और अध्यात्म, दोनों इस बिंदु पर सहमत हैं कि संसार है ही नहीं। जिसे हम संसार कहते हैं, पेड़-पौधे, पहाड़, जीव सबका सूक्ष्म रूप ऊर्जा है। जिसे हम पहाड़ कहते हैं, वह तो ऊर्जा का घनीभूत रूप है। इस संसार की वस्तुओं को हमने नाम दिया है, पहाड़ को चाहे जो भी नाम दीजिए। नाम तो आप द्वारा दिया गया है। जब आप स्वयं प्रामाणिक नहीं हैं तो आपका दिया गया नाम प्रामाणिक कैसे हो सकता है। विज्ञान भी कहता है कि हमारी आंखें जो देखती हैं वही निर्णय करती हैं कि यह द्रव है कि ठोस। आश्चर्य है कि आंखें स्वयं झूठी रिपोर्ट संग्रह करती हैं। पानी भरे गिलास में लकड़ी टेढ़ी दिखती है।
मरुभूमि में जल दिखता है। खुरदुरे चेहरे में सौंदर्य दिखता है। हड्डियों के ढांचे में प्रेयसी दिखती है। यह सब इसलिए दिखता है, क्योंकि आपने मान लिया है कि यह सौंदर्य है। आपका मानना कितना प्रामाणिक है, उसे आपसे अधिक कौन जान सकता है। जब आप अपने नौकर को लखपतिया और करोड़ीमल कह सकते हैं, तो आपकी बात कितनी प्रामाणिक है, इसकी व्याख्या आप स्वयं करें।
मन की शक्ति
मन दो प्रकार का होता है। पहला चेतन व दूसरा अवचेतन। चेतन मन के द्वारा मनुष्य जाग्रत अवस्था में सोचता है और बाहरी दुनिया का अनुभव करता है। अवचेतन मन इन्हीं सब बातों को ग्रहण कर सुरक्षित रख लेता है। एक प्रकार से अवचेतन मन को आत्म तत्व के साथ जोड़कर देखा जाता है।
एक नियत परिस्थिति में अचानक प्रतिक्रिया इसी अवचेतन मन से आती है और इसी को आत्मशक्ति भी कहते हैं। दुनिया के सभी धर्म विश्वास के रूप हैं और विश्वास कई तरीकों से स्पष्ट किए जाते हैं। अपने जीवन और ब्रह्मंड के बारे में जैसा विश्वास होगा, मनुष्य को वैसा ही मिलता है। मनुष्य अगर विश्वास कर सके, तो उसके लिए हर चीज संभव है।
नेपोलियन को विश्वास था कि दुनिया में असंभव शब्द है ही नहीं और इसी विश्वास के चलते उसने बड़े-बड़े युद्ध जीते। जहां पर सकारात्मक विश्वास मनुष्य को सफलता दिलाता है, वहीं पर नकारात्मक व निराशाजनक सोच मनुष्य को असफलता, संदेह व आत्मविश्वास में कमी की ओर ले जाती है। आज चारों तरफ आपाधापी व स्वार्थपरायणता ने अनेक नौजवानों को नकारात्मक सोच की तरफ अग्रसर कर दिया है। जब यह सोच ज्यादा बढ़ जाती है, तो अवचेतन मन ऐसी स्थिति में उनसे आत्महत्या जैसा अपराध करा देता है। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य का अवचेतन मन शक्ति का भंडार है, जिसमें जैसा मनुष्य एकत्र करेगा, उसका कई गुना वह पाएगा। इसीलिए कहा गया है कि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। अमेरिका के डॉ. जोसेफ मर्फी ने शोध से पता लगाया कि यदि चेतन मन को विश्वास हो जाता है कि वह अब ठीक हो सकता है, तो अवचेतन मन उसे पूरा करने के लिए शक्ति पैदा करता है और अवचेतन मन के आदेश पर मस्तिक उसी प्रकार के हार्मोन पैदा करके उस कार्य को पूरा करता है।
ऐसी मान्यता है कि अवचेतन मन केवल वर्तमान जीवन को ही नहीं प्रभावित करते, बल्कि आत्मा के साथ दूसरे शरीर धारण के समय भी साथ रहता है। दूसरे जन्म में इसी अवचेतन मन के कारण व्यक्तित्व निर्माण व संस्कार प्राप्त होते हैं। इसीलिए यदि मनुष्य वर्तमान जीवन और अगले जीवन में आनंद चाहता है, तो उसे अपने चेतन मन व अवचेतन मन को सकारात्मक सोच व विचारों से परिपूर्ण
जीवन जीना एक कला है
अच्छे गुणों का आचरण करके इस अनगढ़ सादे सरल जीवन को सुगढ़ता प्रदान कर उत्तम बनाया जा सकता है। इसी प्रकार बुरी बातों की ओर आकृष्ट होकर आचरण निम्न स्तर के हो जाने पर मनुष्य पतन के गर्त तक पहुंच सकता है। वास्तव में जीवन जीना एक कला है। इस कला के माध्यम से अच्छे आचरण द्वारा लक्ष्य की उपलब्धि प्राप्त हो सकती है। प्रत्येक व्यक्ति में महानता के गुण बीज रूप में होते हैं। उस बीज को जल, वायु, वातावरण और देख-भाल के माध्यम से पौधे के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इस प्रकार के आचरण के अभ्यास को ही साधना कहते हैं।
साधक को आत्मचिंतन करना आवश्यक है, जिसके माध्यम से साधक को अपनी अच्छाइयों व बुराइयों को तलाशना होता है। अपनी कमियों को तलाशकर दूर करना और अच्छाइयों को साहस के साथ आचरण में लाकर प्रगति के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। अपने आप को दुष्प्रवृत्तियों से हटाकर सत्वृत्तियों का अनुसरण करने का नाम ही आत्म-प्रगति है। प्राय: व्यक्ति का चिंतन और उसके क्रिया-कलाप अपने शरीर, मन व परिवार की आवश्यकताओं और सुख-सुविधाओं तक ही सीमित रह जाते हैं। इस प्रकार वह भौतिक उपलब्धियों से संतुष्ट होकर ही उसमें फंसा रह जाता है। मनुष्य परमात्मा की सवरेत्तम कृति है। इसलिए उसे मनुष्य के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने की साधना करनी चाहिए। दुष्प्रवृत्तियों में जकड़े लोग तो इस जीवन को नर्क बना ही लेते हैं, परंतु सामान्य या अच्छी वृत्तियों वाले भी यदि अल्प भौतिक उपलब्धियों से सन्तुष्ट होकर निष्कि्त्रय हो जाते हैं, तो वे भी जीवन में एक प्रकार से असफल ही माने जाएंगे। इसके लिए साधक को चाहिए कि वह न्यूनतम भौतिक उपलब्धियों के सहारे और पढ़ें »
